जिस उम्र में हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं,उस उम्र में रोटी के लिए दर दर भटकता रहा मासूम
गढ़वा से विकास कुमार की रिपोर्ट
कभी कभी किसी खबर को लिखना आसान नहीं होता,क्योंकि कुछ खबरें सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं,दिल के भीतर उतर जाती हैं,कुछ कहानियां ऐसी होती हैं,जिनमें मौत से ज्यादा दर्द उस जिंदगी का होता है,जो मौत से पहले किसी ने मजबूरी में जी थी,केतार थाना क्षेत्र के छाताकुण्ड गांव के अगरीया टोला से सामने आई 16 वर्षीय रौशन कुमार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है,एक ऐसा मासूम,जिसकी उम्र सपने देखने की थी,लेकिन जिंदगी ने उसके सामने भूख,अकेलापन और बेबसी खड़ी कर दी,बुधवार की रात करीब 9 बजे तबीयत बिगड़ने के बाद रौशन ने दम तोड़ दिया।
रौशन के पास न मां का आंचल था,न पिता का सहारा :- रौशन कुमार,पिता मोहन राम और माता प्रतिमा देवी के परिवार की परिस्थितियां लंबे समय से ठीक नहीं थीं,बताया जाता है कि उसके पिता मजदूरी के लिए बाहर चले गए थे,वहीं,मां प्रतिमा देवी पति की शराब की लत और कथित प्रताड़ना से परेशान होकर अपनी एक बेटी के साथ मायके चली गई थीं,बाद में मायके वालों ने उनकी दूसरी शादी करा दी और इसी के साथ शायद रौशन की जिंदगी से परिवार का वह सहारा भी छिन गया,जिसकी जरूरत उसे सबसे ज्यादा थी।
भूख मिटाने के लिए घर घर मांगता था खाना :- ग्रामीणों के अनुसार,रौशन कई दिनों से गांव गांव और घर घर जाकर भोजन मांगकर अपना पेट भर रहा था,जरा सोचिए,जिस उम्र में एक बच्चा स्कूल से लौटकर मां से खाना मांगता है,उसी उम्र में रौशन को यह सोचना पड़ रहा था कि आज खाना मिलेगा भी या नहीं,जिस उम्र में उसके कंधे पर स्कूल बैग होना चाहिए था,उसी उम्र में उसके सामने जिंदगी का सबसे बड़ा सवाल था,भूख कैसे मिटेगी।
धीरे धीरे कमजोर होता गया शरीर,लेकिन मदद के लिए नहीं बढ़े हाथ :- कहा जा रहा है कि उचित भोजन और देखभाल के अभाव में रौशन की तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई,कमजोरी बढ़ती गई और हालात गंभीर होते गए,लेकिन शायद उसकी खामोश पीड़ा किसी जिम्मेदार दरवाजे तक नहीं पहुंच सकी,बुधवार की रात करीब 9 बजे उसकी तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ी और आखिरकार 16 साल की यह जिंदगी हमेशा के लिए खामोश हो गई।
रौशन चला गया,लेकिन छोड़ गया कई कड़वे सवाल :- रौशन की मौत के बाद गांव में मातम है,लेकिन इस मौत ने सिर्फ एक परिवार को नहीं रुलाया,बल्कि समाज और प्रशासन के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं,एक नाबालिग बच्चा आखिर इतने दिनों तक भूख से लड़ता रहा,किसी को पता क्यों नहीं चला,क्या किसी ने यह जानने की कोशिश की कि रौशन अपना पेट कैसे भर रहा है,क्या समय रहते उसे भोजन,इलाज और संरक्षण मिल जाता तो शायद उसकी जिंदगी बचाई जा सकती थी और सबसे बड़ा सवाल,क्या रौशन की मौत सिर्फ उसकी किस्मत थी, या हमारी सामूहिक लापरवाही का भी हिस्सा।
रौशन अब इस दुनिया में नहीं है,उसके हिस्से की भूख खत्म हो गई :- उसकी तकलीफ खत्म हो गई,लेकिन उसकी मौत की कहानी खत्म नहीं होनी चाहिए,क्योंकि यह सिर्फ 16 वर्षीय रौशन की कहानी नहीं है,यह उन तमाम बच्चों की कहानी है,जो गरीबी,पारिवारिक बिखराव और मजबूरी के बीच चुपचाप अपनी जिंदगी काट रहे हैं और शायद किसी की नजर उन तक नहीं पहुंच रही।
एक बच्चा भूख से मर गया…अब सवाल है,क्या हम उसकी मौत से कुछ सीखेंगे :- ग्रामीणों ने प्रशासन से पूरे मामले की जांच कराने और पीड़ित परिवार को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने की मांग की है,रौशन की तस्वीर अगर हमारे सामने होती,तो शायद हम उसकी आंखों में बहुत कुछ पढ़ पाते,शायद वह कुछ मांगता नहीं,सिर्फ इतना चाहता कि कोई उसे अपना कहकर पुकार ले,लेकिन अफसोस,रोटी की तलाश में भटकता 16 साल का रौशन अब हमेशा के लिए खामोश हो गया,और पीछे छोड़ गया है एक ऐसा सवाल,जिसका जवाब सिर्फ प्रशासन को नहीं,हम सबको देना है।
