मिट्टी की खुशबू से बाजार तक पहुंची जनजातीय हुनर की कहानी

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गढ़वा से विकास कुमार की रिपोर्ट



किसी के लिए बांस की बनी टोकरी सिर्फ एक घरेलू सामान हो सकती है,लेकिन उसे बनाने वाले जनजातीय शिल्पकार के लिए वह उसकी मेहनत,उसकी पहचान और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा की कहानी होती है,इसी हुनर को पहचान देने और इन मेहनतकश हाथों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सोमवार को गढ़वा टाउन हॉल में जनजातीय शिल्पकार पंजीकरण मेला (Tribal Artisan Empanelment Mela–TAeM) आयोजित किया गया,ट्राइफेड (TRIFED), जनजातीय कार्य मंत्रालय,भारत सरकार द्वारा आयोजित इस मेले में गढ़वा एवं आसपास के जिलों से 226 जनजातीय शिल्पकारों एवं कारीगरों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया,मेले में पहुंचे शिल्पकारों ने अपने हाथों से तैयार किए गए पारंपरिक हस्तशिल्प,प्राकृतिक उत्पाद और घरेलू उपयोग की सामग्री का प्रदर्शन किया।

उपायुक्त ने किया उद्घाटन,जनजातीय कला की सराहना :- कार्यक्रम का उद्घाटन गढ़वा के उपायुक्त पशुपतिनाथ मिश्र, IAS ने किया,इस अवसर पर TRIFED झारखंड एवं बिहार के क्षेत्रीय प्रबंधक राज कुमार,IOFS, जिला कल्याण पदाधिकारी देवानंद राम,DPM बिमलेश शुक्ला,JSS के निदेशक प्रशांत कुमार मिश्र सहित TRIFED और JSS के अधिकारी एवं कर्मी उपस्थित रहे,उद्घाटन के दौरान उपायुक्त ने शिल्पकारों द्वारा तैयार उत्पादों का अवलोकन किया और उनकी कला एवं कौशल की सराहना की,उन्होंने कहा कि जनजातीय कला और शिल्प देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं,ऐसे आयोजनों के माध्यम से स्थानीय शिल्पकारों को पहचान के साथ साथ बेहतर बाजार और आय के अवसर मिल सकते हैं।

हाथों के हुनर में दिखी सदियों पुरानी संस्कृति :- मेले में बांस से बने डलिया,टोकरियां और विभिन्न उपयोगी वस्तुएं लोगों के आकर्षण का केंद्र रहीं,वहीं घास और प्राकृतिक रेशों से बने उत्पाद,पत्तों से तैयार चटाइयां,लकड़ी के रसोईघर एवं घरेलू सामान भी प्रदर्शित किए गए,लाख से बने आभूषण और सजावटी सामान,पारंपरिक आभूषण,होम डेकोरेशन की वस्तुएं,सिल्क एवं कॉटन के वस्त्र तथा हस्तकरघा उत्पादों ने मेले में जनजातीय रचनात्मकता की खूबसूरत तस्वीर पेश की,इन उत्पादों को देखकर साफ महसूस हुआ कि यहां सिर्फ सामान नहीं बिक रहा था,बल्कि जनजातीय समाज की संस्कृति,परंपरा और पीढ़ियों से चले आ रहे हुनर की कहानी सामने आ रही थी।

Van Dhan और प्राकृतिक उत्पादों ने भी खींचा ध्यान :- मेले में Van Dhan एवं Natural/Organic Food Products का भी विशेष प्रदर्शन किया गया,स्थानीय जनजातीय समुदायों द्वारा तैयार एवं संग्रहित प्राकृतिक खाद्य उत्पादों ने यह दिखाया कि प्रकृति से जुड़ा पारंपरिक ज्ञान भी आजीविका का मजबूत माध्यम बन सकता है।

TRIFED से जुड़कर राष्ट्रीय बाजार तक पहुंचेंगे उत्पाद :- TRIFED के क्षेत्रीय प्रबंधक राज कुमार,IOFS ने बताया कि TRIFED का उद्देश्य जनजातीय समुदाय के पारंपरिक ज्ञान,कला और कौशल को बाजार से जोड़ते हुए उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है,TAeM के माध्यम से शिल्पकारों का पंजीकरण एवं Empanelment, उत्पादों का मूल्यांकन और चयन तथा उन्हें व्यापक बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया जा रहा है,मेले में TRIFED एवं JSS की टीम ने शिल्पकारों के दस्तावेजों,उत्पादों और शिल्प कौशल की जानकारी प्राप्त कर आवश्यक प्रक्रिया पूरी की,साथ ही उन्हें उत्पादों की गुणवत्ता,पैकेजिंग,बाजार की जरूरतों और डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल के बारे में भी जानकारी दी गई।

गढ़वा से राष्ट्रीय बाजार तक पहुंचेगा जनजातीय हुनर :- चयनित एवं पात्र शिल्पकारों को आगे TRIFED की विपणन एवं आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ने की दिशा में आवश्यक कार्रवाई की जाएगी,इससे गढ़वा और आसपास के क्षेत्रों में तैयार होने वाले पारंपरिक उत्पादों को स्थानीय बाजार से आगे राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का अवसर मिलेगा,मेले में 226 शिल्पकारों की भागीदारी ने यह साबित कर दिया कि गढ़वा के जनजातीय समाज के हाथों में हुनर की कोई कमी नहीं है,जरूरत सिर्फ उस हुनर को सही पहचान,सही बाजार और सही अवसर देने की है,क्योंकि जब किसी शिल्पकार के हाथों से निकली एक छोटी सी टोकरी बड़े बाजार तक पहुंचती है,तो उसके साथ सिर्फ एक उत्पाद नहीं जाता,उसके साथ एक परिवार की उम्मीद,एक पीढ़ी की मेहनत और एक पूरी संस्कृति की पहचान भी आगे बढ़ती है,TRIFED का यह आयोजन इसी उम्मीद को मजबूत करता नजर आया,स्थानीय हुनर को पहचान मिले,मेहनत को सम्मान मिले और गढ़वा की जनजातीय कला की खुशबू देश के हर कोने तक पहुंचे।

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